लोक आस्था का महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान गुरुवार को नहाय-खाय के साथ आरंभ हो गया है। व्रत के दूसरे दिन आज शाम में खरना की पूजा होगी। खरना के लिए व्रतियों ने सुबह से निर्जला व्रत रखा है, जिसके बाद आज शाम में व्रती गेहूं के आटे की रोटी, गुड़़-चावल और दूध से बनी खीर के साथ फल-फूल, मिठाई से खरना की पूजा करेंगी और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करेंगी। उसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा।

खीर के अलावा पूजा के प्रसाद में मूली, केला भी रखा जाता है। इस दिन मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर प्रसाद तैयार किया जाता है। व्रती महिलाएं भगवान सूर्य की पूजा-अर्चना करने के बाद ही शाम में प्रसाद ग्रहण करती हैं। उसके बाद घर-परिवार, सगे संबंधी खरना का प्रसाद ग्रहण करते हैं। खरना का प्रसाद खाने के लिए दूर-दूर से लोग व्रती के घर आते हैं !

खरना पूजा व अर्घ्य मुहूर्त 

खरना पूजा - शुक्रवार शाम - 5.32 बजे से 7.40 बजे तक 

अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य - शनिवार शाम 5.32 बजे तक 

प्रात:काल सूर्य को अर्घ्‍य- रविवार सुबह 6.29 बजे के बाद 

पटना के छठ घाटों पर मेले जैसा माहौल

कल से पटना के गंगातट पर बिल्कुल मेले-सा नजारा देखने को मिल रहा है। रातभर लोगों के गंगातट पर रुकने की व्यवस्था की गई है। दूर-दूर से लोग यहां छठ की पूजा करने आ रहे हैं। छठ के गीतों से गंगा तट पर बने छठ के घाट गुंजायमान हैं। पूरा शहर छठमय नजर आ रहा है। व्रती के साथ पूरा परिवार छठ घाट पर आज से चार दिनों तक साथ रहेगा। भक्तिभाव का एेसा संगम विरले ही देखने को मिलता है। 

नहाय-खाय के बाद खरना आज

छठ के पहले दिन दिन कद्दू-भात के प्रसाद का महत्व होता है। वहीं पर्व के दूसरे दिन व्रती सुबह से निर्जला उपवास करेंगी। दिनभर घर या नदी किनारे व्रती गंगाजल से साफ-सफाई करेंगी। शाम में मिट्टी के चूल्हे में आम की लकड़ी जलाकर पीतल या मिट्टी के बरतन में गुड़, चावल और दूध से खीर बनाएंगी। फिर गंगाजल से धुले गेहूं को पिसवाकर रखे आंटे से पूड़ी या रोटी बनाएंगी। शाम होते ही छठी मईया की पूजा कर प्रसाद ग्रहण करेंगी। तत्पश्चात घर के बाकी लोग प्रसाद ग्रहण करेंगे। 

चार दिवसीय अनुष्ठान के मौके पर ग्रह-गोचरों के शुभ संयोग

पंडित राकेश झा ने कहा कि कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को रवियोग में गुरुवार को नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व शुरू हो गया है। वहीं शुक्रवार को व्रती खरना का प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला व्रत कर तीन नवंबर को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देेने के साथ व्रत का समापन करेंगी।

शनिवार दो नवंबर को व्रती सायंकालीन अर्घ्य त्रिपुष्कर योग में देंगी। वही तीन नवंबर रविवार को उदीयमान सूर्य को सर्वार्थ-सिद्धि योग में भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करेंगी। पंडित झा ने पुराणों के हवाले से बताया कि सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्यता, सौभाग्य व संतान के लिए किया जाता है।

स्कंद पुराण के अनुसार राजा प्रियव्रत ने भी यह व्रत किया था। राजा प्रियव्रत कुष्ठ रोग से प्रभावित थे। भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए छठ का व्रत किया था। 

व्रत में इन चीजों की है महत्ता 

सूप, डाला - अर्घ्य में नए बांस से बने सूप व डाला का प्रयोग किया जाता है। सूप को वंश की वृद्धि और वंश की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

ईख - ईख को आरोग्यता का प्रतीक माना जाता है। लीवर के लिए ईख का रस काफी फायदेमंद माना जाता है।

ठेकुआ - आटे और गुड़ से बना ठेकुआ समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। 

ऋतुफल - छठ पूजा में ऋतुफल का विशेष महत्व है। व्रती मानते हैं कि सूर्यदेव को फल अर्पित करने से विशिष्ट फल की प्राप्ति होती है। 

पष्ठी तिथि को शाम को सूर्यदेव की पूजा के लिए गंगा-यमुना के विभिन्न घाटों पर हजारों श्रद्धालु एकत्र होंगे। पर्व को लेकर घरों में खासा उत्साह है।